Thursday, December 9, 2010

शायद...

आज होगा तेरा करम शायद,
ये हमारा ही था वहम शायद.

खुद को चूंटी चुभा के देखेंगे,
अब जो हो प्यार का भरम शायद.

आज फिर प्यार करना भूल गए,
आज फिर से था वक़्त कम शायद.

उसको छूने में भी डर लगता है,
गाफिल-ऐ-नींद हो सनम शायद.

और कुछ तो बदल ना पाएंगे,
अपनी आदत बदल लें हम शायद.

राह में तुमने हमें छोड़ दिया,
और चल लेते कुछ कदम शायद.

जुर्म ये हम भी करके देखेंगे,
फिर जो लेंगे कोई जनम शायद